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एईपीसी द्वारा कॉटन यार्न निर्यात पर अंकुश लगाने की मांग

एईपीसी द्वारा कॉटन यार्न निर्यात पर अंकुश लगाने की मांग

By: Textile World Date: 2021-04-12

नई दिल्ली/ राजेश शर्मा
एपेरल एक्सपोर्ट प्रोमोशन कौंसिल (एइपीसी) ने सरकार से कॉटन यार्न के निर्यात पर अंकुश लगाने की मांग की है, क्योंकि बढ़ते भाव के कारण पूरा कपड़ा उद्योग परेशान है। दूसरी ओर यार्न की अधिक मांग और तेजी के कारण स्पिनिंग मिलों को लाभ होने का अनुमान है।
एइपीसी का कहना है कि सरकार को कॉटन यार्न की निर्यात मात्रा तय करने के साथ ही निर्यात शुल्क भी लगाना चाहिए, ताकि निर्यात कम हो और देश में उपलब्धता बढऩे के साथ ही भाव पर काबू पाया जा सके। कपड़ा मंत्री सुश्री स्मृति जुबिन ईरानी को लिखे एक पत्र में एइपीसी ने कहा है कि हालांकि सरकार ने कॉटन यार्न के बढ़ते भाव को रोकने के लिए काफी प्रयास किए हैं लेकिन गत चार महीनों से लगातार हो रही भाव वृद्धि से पूरा कपड़ा उद्योग प्रभावित हो रहा है। कौंसिल के चेयरमेन श्री शक्तिवेल ने सुझाव दिया है कि 26 काउण्ट व इससे ऊपर के कॉटन यार्न के निर्यात पर मात्रात्मक प्रतिबंध लगाया जाए। उन्होंने सुश्री ईरानी से हस्तक्षेप करके यार्न निर्माताओं से देश में सप्लाई बढ़ाने का अनुरोध भी किया है। उल्लेखनीय है कि निर्यात मांग के कारण देश में कॉटन यार्न के भाव में पिछले कुछ महीनों से एक तरफा तेजी आ रही है। यही नही, सप्लाई भी अनियमित होने के समाचार हैं। इससे फैब्रिक निर्माताओं से लेकर गारमेंट निर्माताओं का उत्पादन लागत का गणित बिगड़ गया है। श्री शक्तिवेल ने कुछ दिन पूर्व सरकार के हस्तक्षेप के बाद कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ  इंडिया यानि सीसीआई द्वारा कॉटन के भाव में 1500 रुपए प्रति खंडी तक की कमी करने का स्वागत करते हुए मंत्री महोदया का आभार प्रकट किया। उन्होंने कहा कि सीसीआई द्वारा की गई भाव में कटौती का यार्न के भाव में कमी का कोई असर नहीं आया। उल्लेखनीय है कुछ महीनों से सीसीआई कॉटन के भाव में लगातार बढ़ोतरी कर रही थी, क्योंकि विश्व बाजार में तेजी के साथ ही घरेलू बाजार में भी स्पिनिंग मिलों की मांग अच्छी थी और चीन, बंाग्लादेश और अन्य देशों से कॉटन यार्न की मांग लगातार आ रही थी। यही नहीं, सीसीआई के पास कॉटन का सबसे अधिक स्टॉक होने के कारण भी बाजार में भाव बढ़ रहे हैं। सरकार ने इस वर्ष लगभग 92 लाख गांठ कॉटन की खरीद की है, जो देश में कुल उत्पादन अनुमान का लगभग 25 प्रतिशत से अधिक है। वर्ष 2020-21 के दौरान देश में कॉटन का उत्पादन लगभग 360 लाख टन होने का अनुमान है। 
एइपीसी का कहना है कि वास्तव में देश में कॉटन यार्न के भाव कॉटन में हुई भाव वृद्धि की तुलना में अधिक बढ़े हैं। यार्न में भाव वृद्धि के कारण फैब्रिक की उत्पादन लागत में बढ़ोतरी हुई है और इसका असर रेडीमेड गारमेंट के लागत पर भी तेजी का ही आया है। जानकारों का कहना है कि उत्पादन लागत में आशा से अधिक बढ़ोतरी होने के कारण अब रेडीमेड गारमेंट निर्यातकों को अपने पहले से लिए ऑर्डर पूरे करने कठिन हो रहे हैं तथा कड़ी प्रतिस्पर्धा के कारण नए ऑर्डर भी नहीं मिल रहे हैं। श्री शक्तिवेल ने अपने पत्र में लिखा है कि यदि कॉटन यार्न के भाव में कमी नहीं  आती है, तो न केवल रेडीमेड गारमेंट उद्योग अपितु टेक्सटाइल की पूरी श्रृंखला पर ही विपरीत असर पड़ेगा।
सूत्रों के अनुसार कॉटन यार्न के भाव में भारी वृद्धि के कारण अनेक स्थानों पर पावरलूम  या तो बंद हो गए हैं या उन्होंने उत्पादन कर दिया है, इससे भी देश में फैब्रिक की कमी बनती नजर आ रही है। श्री शक्तिवेल के अनुसार उन्होंने सरकार को सुझाव दिया है कि कॉटन यार्न के निर्यात पर टैक्स लगाकर भी घरेलू बाजार में इसके भाव को कम किया जा सकता है। ऐसा करने से घरेलू बाजार में रोजगार के अवसर बढऩे के साथ ही गारमेंट निर्यात में भी वृद्धि होगी। उनके अनुसार कॉटन यार्न के निर्यात पर टैक्स लगने से स्पिनिंग उद्योग को कोई नुकसान नहीं होगा और केवल थोड़ा सा मुनाफा कम हो सकता है। उल्लेखनीय है कि कपड़ा व रेडीमेड गारमेंट उद्योग का देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान है और न केवल सबसे अधिक रोजगार ही प्रदान कर रहा है, अपितु विदेशी मुद्रा का अर्जन भी कर रहा है।

क्षमता का उपयोग... एजेंसी का अनुमान है कि गत वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में स्पिनिंग उद्योग अपनी स्थापित क्षमता का लगभग 70-80 प्रतिशत उपयोग कर रहा था, जो तीसरी तिमाही में बढ़कर 90 प्रतिशत हो गया। स्पिनिंग उद्योग में क्षमता का उपयोग चालू वित्त वर्ष में भी जारी रहने की संभावना है और इससे मिलों के राजस्व में भी वृद्धि होगी और इससे मिलों का ऑपरेटिंग मार्जिन चालू वर्ष में 200-250 प्वाइंट बढ़ कर लगभग 11 प्रतिशत हो सकता है। इस प्रकार ऑपरेटिंग प्रोफिट लगभग डबल होने का अनुमान है। ऐसे में मिलों के पास स्टॉक में भी कमी आएगी और यह 2-3 माह के स्तर पर आ जाएगा, जबकि गत वर्ष यह 4 माह के बराबर था। क्रिसिल की रिपोर्ट के अनुसार हाल ही में देश में कॉटन के भाव में कमी आई और आगामी दिनों में भी जारी रह सकती है। क्रिसिल ने स्पिनिंग मिलों को सलाह दी है कि वे घबराहट में कॉटन की खरीद न करें।


भाव वृद्धि से कपड़ा उद्योग प्रभावित  स्पिनिंग मिलों के लाभ में वृद्धि का अनुमान
अप्रैल में नहीं होगी भाव वृद्धि...प्राप्त सूचना के अनुसार टेक्सटाइल उद्योग के शीर्ष संगठन-कॉफैडरेशन ऑफ  इंडियन टेक्सटाइल इंडस्ट्री (सिटी) ने स्पिनिंग मिलों से कहा है कि वे अप्रैल में कॉटन यार्न में भाव वृद्धि न करें। उल्लेखनीय है कि विगत दिनों यार्न की सप्लाई की समस्या के समाधान के लिए नेशनल कमेटी ऑन टेक्सटाइल्स एंड क्लोदिंग्स (एनसीटीसी) ने एक हेल्पलाईन पोर्टल आरंभ किया है। गत दिनों एनसीटीसी के कॉ-ऑर्डिनेटर और कॉन्फेडरेशन ऑफ  इंडियन टेक्सटाईल इंडस्ट्री (सिटी) के चेयरमैन श्री टी राजकुमार ने फैब्रिक निर्माताओं से यार्न की कमी और यार्न की अनियमित सप्लाई के बारे में अपनी डिटेल इस पोर्टल पर डालने के लिए भी कहा था।

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