सेम्पलिंग में लायक्रा बेस और मिक्स कपड़ों के गारमेण्ट की ओर झुकाव

मुंबई/ रमाशंकर पाण्डेय
सीजनल ग्राहकी पूरी होने के बाद अब बाजारों में 15 जुलाई के बाद ही त्यौहारी ग्राहकी निकलने की संभावना है। रेडीमेड गारमेण्ट में उत्तर भारत की बुकिंग अच्छी रही है, परंतु रिटेल के साथ थोक में गारमेण्ट की मांग कमजोर है। यह मंदा सीजन माना जाता है और इसमें चौतरफा पुराने स्टॉक को कम भाव पर बेचने की होड़ रहती है, लेकिन इस बार अभी तक डिस्काउंट की कोई अधिकृत घोषणा कहीं से भी नहीं की गई है, जबकि रिटेलर्स अपने ग्राहकों को कुछ डिस्काउंट दे रहे हैं। यह दर्शाता है कि उत्पादकों एवं रिटेलर्स के पास बहुत अधिक स्टॉक नहीं है। निर्यात में कारोबार धीमा है। गारमेण्ट तथा कपड़ा उत्पादकों का पूरा ध्यान सेम्पलिंग के साथ फेयरों के आयोजन पर लगा हुआ है।
स्कूल यूनिफॉर्म की रिटेल ग्राहकी में भारी सुधार आया है। करीब दो वर्षो के बाद स्कूलों के खुलने के बाद यूनिफॉर्म की बिक्री बढ़ी है। कोरोना काल में सबसे अधिक मार इसी क्षेत्र को सहनी पड़ी थी, कारण कि स्कूलों के बंद होने के बाद स्कूल यूनिफॉर्म के कपड़ों के उत्पादकों से लेकर यूनिफॉर्म बनाने वाली इकाईयों की एक बड़ी पूंजी फंस गई थी। अब जाकर इन इकाइयों एवं उत्पादकों को राहत मिली है, भारी मांग के बीच यूनिफॉर्म के मूल्य में भी इजाफा हुआ है। कुछ स्कूल विशेष दुकानों से ही गणवेश खरीदने का आग्रह करते हैं और उन दुकानों पर जाने के बाद अभिभावकों को स्कूल यूनिफॉर्म की बहुत ही ऊंची कीमत चुकानी पड़ रही है, इस तरह की शिकायतें भी सुनने को मिल रही है। 
अब गारमेण्ट फेयर और कपड़ों के फेयर अधिक हो रहे हैं। सीएमएआई का नेशनल गारमेण्ट फेयर इस बार एक सप्ताह देरी से 19 से 22 जुलाई तक होने जा रहा है। आमतौर पर 15 जून से जुलाई के पहले सप्ताह तक सेम्पलिंग का काम पूरा हो जाता है। सेम्पलिंग के बाद जो टें्रड मिल रहा है, उसके अनुसार कॉटन कपड़ों के मंहगा होने के बाद मिक्स कपड़ों की ओर सभी का झुकाव अधिक लग रहा है, लेकिन इनमें सबसे अधिक जोर लायक्राबेस कपड़ों पर है। कपड़ों में अभी जो काम हो रहा है, वह सिर्फ  सेम्पल तक सीमित है, लेकिन जैसे ही फेयरों का समापन होता है, कपड़ों के साथ गारमेण्ट की मांग निकलनी शुरू होगी क्योंकि सबसे पहले गारमेण्ट की मांग और उसके बाद कपड़ों की निकलती है। 
भारत से टेक्सटाइल एवं गारमेण्ट का निर्यात मई महिने में 27.8 प्रतिशत बढक़र 1.41 अरब डॉलर हो गया है, तथापि वैल्यू एडेड उत्पादों का निर्यात थोड़ा धीमा रहा है। वैसे एपेरल का निर्यात पिछले दो वर्ष में 13 प्रतिशत तक बढ़ा है। विदेशी आयातक बढ़ी कीमत चुकाने को तैयार नहीं हैं, इसलिए यूरोप सहित विश्व की समर मांग कैसी रहेगी, इसे लेकर अभी भी अनिश्चितता अधिक है। यह चिंता सिर्फ भारत की नहीं है, बांग्लादेश जो गारमेण्ट उत्पादन का करीब 60 प्रतिशत निर्यात यूरोप के बाजारों में करता है, उसे भी है। निर्यात में लगी कई एपरल इकाइयां नये आर्डर लेने में पूरी सावधानी बरत रही है, जबकि बड़े फैशन ब्रांड जो उत्पादन एवं निर्यात दोनों में कार्य कर रहे हैं, अच्छी पोजीशन में हैं।


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