NEWS

Textile Textile Textile Textile Textile Articles Textile Textile Articles Textile Textile Textile Textile Textile Textile Textile Textile Textile Textile Textile Textile Textile Textile Textile Textile Textile Textile Textile Textile Textile Textile Textile Textile
फैंसी एवं महंगे फैब्रिक्स में मांग का अभाव

फैंसी एवं महंगे फैब्रिक्स में मांग का अभाव

By: Textile World Date: 2020-09-12

कम भाव पर भी पुराने कपड़ों में कोई लेवाल नहीं, विंटर प्रोग्रामों पर जोर

मुंबई/ रमाशंकर पाण्डेय

कपड़ा बाजार में सामान्य ढंग से कामकाज नहीं हो रहा है। दिसावरी मण्डियों में ग्राहकी का कुछ अता पता नहीं है। दिसावरों के व्यापारी बाजारों में नहीं आ रहे हैं। जो जरूरी समझते हैं, उसका आर्डर भी ऑनलाइन के माध्यम से देते हैं। उत्पादन स्तर पर फैंसी कपड़ों पर कोई जोर नहीं है। अभी इनकी मांग भी नहीं है। पहले का भी भरपूर स्टॉक पड़ा है, कपड़ों की खरीदी नहीं है। कोविड-19 के कारण पिछले चार-पांच महीने से घरों में बंद लोगों के पास रूपये की भारी किल्लत है। नौकरी पेशा और स्वरोजगार वालों पर दोहरी मार पड़ी है। महंगाई इतनी बढ़ी है कि घर खर्च चलाने में भी कठिनाई हो रही है। कपड़े में अब विंटर सीजन की तैयारी जोरदार ढंग से की जा रही है।  फैंसी एवं पार्टी वीयर कपड़ों की मांग न तो थोक बाजार में और न ही रिटेल में है। रिटेल स्तर पर सिर्फ  घरों में इस्तेमाल होते आइटमों की ही मांग है। कोराना संक्रमण के डर से घरों में रह रहे लोगों की मांग इन्हीं आइटमों की निकला करती है। रिटेल स्तर पर ऐसे आइटम की बिक्री बाजारों के खुलने पर बड़ी तेजी से बढ़ी थी, लेकिन इसमें भी ठहराव आ गया है। सूटिंग एवं शर्टिंग की कोई मांग नहीं है। इतना ही, नहीं पुराने स्टॉक कम भाव पर लेने को भी ग्राहक तैयार नहीं है। बाजार में इन दिनों सीमित प्रमाण में उचित दाम पर दैनिक उपयोग के आइटमों की ही मांग है। त्योहारों के शुरू होने पर उम्मीद की जा रही थी कि अब बाजार में कामकाज गतिशील होगा, जो फीका ही साबित हुआ है।

 

वीविंग क्षेत्र में स्थितियां धीरे-धीरे सुधरती जा रही है। जहां पहले बहुत कम लूमों पर कपड़ों का उत्पादन हो रहा था, वहां अच्छी बढ़ोतरी हुई है। प्रोसेसिंग इकाईयों में कुछ सुधार हुआ है। भिवंडी में गांव गए श्रमिकों के लौटने से लूमों पर उत्पादन बढऩे लगा है। कॉटन यार्न मजबूत होने से ग्रे सूती कपड़ों के भाव भी बढ़ाकर बोले जा रहे हैं। इचलकरंजी में 50 से 60 प्रतिशत लूमों पर ग्रे कपड़ा उतर रहा है, लेकिन यहां लूम एक पाली में ही चल रहे हैं। जिन लूमों पर पहले मर्दानी कॉटन धोती का उत्पादन हो रहा था, अब धोती की मांग नहीं होने से इन लूमों को कैम्ब्रिक के उत्पादन में बदल दिया गया है। पोपलीन एवं ट्वील की लागत में फ र्क नहीं होने से भाव एक समान हो गए हैं।

 

निर्यात की दृष्टि से वैश्विक स्थितियां फि लहाल अच्छी नहीं होने से कपड़ों की मांग नहीं है। चालू वर्ष में कोरोना के कारण निर्यात बहुत ही कमजोर अथवा यों कहें कि संभव ही नहीं हो सका। अब जब वैश्विक स्तर पर भी स्थितियां धीरे-धीरे सुधर रही है, ऐसे में देश से कपड़ों का निर्यात सुधरने में समय लग सकता है। जिस प्रकार से पिछले कुछ समय से चीन को लेकर वैश्विक परिस्थितियां बदली हैं,नये समीकरण बने हैं, उसे देखते हुए देश तथा अन्य राज्यों के उन प्रमुख केंद्रों से निर्यात के नये द्वार खुल रहे हैं। विशेषकर टेक्सटाइल उत्पादों का निर्यात करने के लिए अच्छा एवं अनुकूल समय आ गया है, जरूरत सिर्फ  उचित एवं योग्य कदम उठाने की है, ताकि निर्यातकों को प्रोत्साहन मिले।

 

चीन से आयात रोकने पर जोर है, फिर भी आयात हो रहा है। चीन की जड़ें कपड़ा उद्योग के कुछ क्षेत्रों में बहुत गहरी हैं और इनके विकल्प अभी सीमित हैं। टेक्सटाइल के कच्चे माल का चीन से आयात रोकना जरूरी है। चीन से कपड़ों का सस्ता आयात तभी रुक सकता है, जब देश में उच्च दर्जे एवं टेक्नोलॉजी वाली मशीनों के माध्यम से फैंसी तथा आकर्षक फैब्रिक का बड़े स्तर पर उत्पादन किया जाए। इसके लिए मशीनों के आधुनिक होने के साथ कुशल कारीगरों की उद्योग को जरूरत है। कपड़ा उद्योग क्षेत्र में चीन को तगड़ी प्रतिस्पर्धा देने के लिए सबसे पहले टेक्सटाइल मशीनरी क्षेत्र को आत्मनिर्भर बनाना होगा। रोजगार सृजन और निर्यात बढ़ाने की यही मजबूत कड़ी है।  एक रिपोर्ट के अनुसार आज भी टेक्सटाइल मशीनरी का अधिकांश आयात चीन से किया जाता है। देश में एम्ब्रॉयडरी व वीविंग क्षेत्र में जरूरी मशीनों के लिए चीन पर निर्भरता को नकार नहीं सकते। इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत में ऐसी मशीनों का उत्पादन पिछले वर्षो की तुलना में अब सुधरा है। जिस मशीन का उत्पादन चाहिए, वह हो रहा है। रिपोर्ट कहती है कि सूरत में साड़ी, डे्रस मटीरियल, लहंगा इत्यादि पर लगाया जाता स्टोन-टीकी, सीक्वेंस, बार्डर, लेसपट्टी का आयात बड़े पैमाने पर चीन से किया जाता है। चीन से आयात यह सामान इतना सस्ता होता है कि सूरत के स्थानीय उत्पादक चीन के प्रतिस्पर्धी भाव में यह माल उपलब्ध नहीं करा सकते हैं। आयात की विसंगति के इस कारण को दूर करना होगा।

 

ग्रे कपड़ों में एयरजेट लूम की 40/40, 124/64, 63’’ पना पोपलीन का भाव हाल 52 रू है। 40/40, 132/72, 63’’ क्वालिटी के ग्रे का भाव 53 रू और 40/40, 132/72 क्वालिटी का 54 रू है। फिलहाल ट्वील का भाव भी इसी तरह है, क्योंकि दोनों के उत्पादन की लागत एक समान आ रही है। 30/30 रेयॉन 48’’ पना 14 किलो की क्वालिटी का भाव 30 रू है, तो 12 किलो की क्वालिटी का भाव 28 रू है 68/60, 63’’पना 17 से 17.50 किलो की क्वालिटी के रेयॉन का भाव 38 रू है।चीन की वेल्वेट 58’’से 60’’ पना का प्रति मीटर भाव 225 से 250 रू है। विंटर सीजन में इसकी मांग बहुत अधिक होती है, इसका उपयोग कोट एवं लेडीजवेर में सबसे अधिक होता है।

Latest News

© Copyright 2020 Textile World