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मानसून में फिनिश अथवा ग्रे कपड़ों की मांग घटी, प्रोसेस हाउसों में काम धीमा प्रमुख थोक बाजारों के खुलने की संभावना बढ़ी

मानसून में फिनिश अथवा ग्रे कपड़ों की मांग घटी, प्रोसेस हाउसों में काम धीमा प्रमुख थोक बाजारों के खुलने की संभावना बढ़ी

By: Textile World Date: 2020-07-15

मुंबई/ रमाशंकर पाण्डेय

यहां प्रमुख कपड़ा बाजारों जैसे कि एम जे मार्केट, मंगलदास मार्केट, स्वदेशी मार्केट, हिंदमाता सहित कुल 12 छोटे-बड़े बाजार है, जिनमें से कुछ खुदरा कारोबार करने वाले बाजार ऑड-इवन आधार पर आठ जून को खुल गए थे। सबसे बड़े एम जे मार्केट को अब पूरी सतर्कता के साथ खोले जाने की चर्चा हो रही है, लेकिन बाजार सिर्फ  सप्ताह में दो दिन ही खुल सकता है। मंगलदास मार्केट के भी शुरू होने की हलचल तेज है, संभवत: यह बहुत जल्द खुल भी जाए, मगर समस्या आवागमन की है। मुंबई में लोकल ट्रेन की सुविधा सस्ती के साथ अधिक भरोसे और शीघ्र गंतव्य तक पहुंचने का सबसे बेहतरीन साधन माना जाता है, वह 12 अगस्त तक बंद रहने वाली है। भिवंडी, मालेगांव, इचलकरंजी जैसे ग्रे कपड़ा उत्पादन केंंद्रों पर कपड़ों का उत्पादन बड़ी धीमी गति से चल रहा है। जो माल बन रहा है, वह प्रोसेस अथवा डार्इंग इत्यादि के लिए कम जा रहा है, कारण कि न तो कपड़ों की मांग है और न ही प्रोसेस हाउसों में श्रमिक हैं, जहां इनका प्रोसेस किया जाए। ग्रे कपड़ों की मांग जब तक बाजार पूरी तरह से सक्रिय नहीं होते, कोरोना का संक्रमण फैलने से रुकता नहीं है, तब तक बाजार शिथिल ही रहने वाला है। वैश्विक परिदृश्य के कमजोर होने और सर्वत्र सबसे अधिक ध्यान कोरोना संक्रमण को रोकने तथा लोगों की जान बचाने पर होने से कपड़ों की मांग में तत्काल अथवा भावी दो -चार महीने में कोई बड़ा उछाल आना संभव नहीं है।   मुंबई में कोरोना के मामले लगातार बढ़ रहे हंै, इसके साथ ही कारोबारी गतिविधियां भी धीरे-धीरे पटरी पर लौटने लगी है। जब देश में लॉकडॉउन लगा तब कपड़ा की बड़ी एवं छोटी दुकानों तथा बड़े-बड़े शोरूमों में ताला लगा था। अनलॉक-1 में कपड़े की रिटेल दुकानें खुली है, परंतु लोग जमकर खरीदी  नहीं कर रहे है। शादी तथा मांगलिक कार्यक्रम टाल दिए गए है, अत: इन प्रसंगों पर रिश्तेदारों को उपहार के बतौर दिए जाते कपड़ों जैसे कि साड़ी, ड्रेस मटीरियल, पैंट शर्ट इत्यादि की खरीददारी न के बराबर है। लोग रोजमर्रा के उपयोग के जरूरी कपड़ों की ही खरीदी कर रहे हैं। छोटी दुकानों पर सेल लगा है। अभी बाजारों में कारोबार 15 से 20 प्रतिशत के करीब हो रहा है। कारोबारियों को उम्मीद है कि वायरस का खतरा कम होने पर तथा लोकल टे्रनों की सुविधा शुरू हो जाने पर मुंबई के बाजारों की ओर लोगों का आना शुरू हो जाएगा। अभी ग्राहक अपने घरों के निकट के स्टोरों में उपलब्ध स्टॉक में से जरूरी कपड़ों की खरीदी कर रहे है, जिनकी हाल उनको अधिक जरूरी लग रहा हैं। दुकानों में पुराने माल का स्टॉक हैं। दुकानदार सेल लगाकर माल निकाल रहे हैं। कपड़ों का उत्पादन धीमी गति से आगे बढ़ रहा है लेकिन तैयार माल की निकासी अभी उचित ढंग से नहीं हो पा रही है। इसलिए स्टॉक करने में सक्षम वीवर्स ही आगे कपड़ों का उत्पादन जारी रख सकते हंै, जबकि जॉब पर लूम चलाने वाले वीवर्स का दौर मुश्किल भरा है।

कॉटन टेक्सटाइल के निर्यात में लगातार हो रही गिरावट से निर्यातक चिंतित हैं। अप्रेल 19 से फरवरी 2020 की अवधि में निर्यात में 16.50 प्रतिशत की कमी आई है। इस अवधि में निर्यात घटकर 940.50 करोड़ डालर रहा है, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में निर्यात 1126.2 करोड़ डॉलर था। कोविड-19 के मामले आने शुरू होने के बाद मार्च से मई के दौरान कॉटन टेक्सटाइल के निर्यात को सबसे तगड़ा झटका लगा है। अप्रेल-मई में कॉटन यार्न सहित कॉटन टेक्सटाइल के निर्यात में 64.55 प्रतिशत की बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। दूसरी ओर सूती कपड़ा और मेडअप्स का निर्यात मात्र 3.05 प्रतिशत बढ़ा है। यूएस एवं ईयू जैसे दो टॉप मार्केट के ग्राहक आर्डर कैंसल कर रहे हैं।  बांग्लादेश से आयात किया जाता कपड़ा अथवा गारमेण्ट अब संभवत: बांग्लादेश का हो या फि र भारत का होना चाहिए। चीन से जिन बंदरगाहों पर यह आयात किया जाता है, वहां अब कस्टम विभाग की कड़ाई हो सकती है। यदि ऐसा होता है तो चीन की ओवरइन्वाइसिंग का खेल कम होगा, कपड़ों का आयात घटेगा और इसका लाभ भारत की टेक्सटाइल एवं क्लोदिंग उद्योग को होगा। चीन से फैंसी कपड़ा, जैकेट, विंटरवेयर, पोलिएस्टर स्पोट्र्स, इत्यादि अयात किया जाता है। आयात में बड़े पैमाने में अंडर इन्वाइसिंग होती रही है और इसके खिलाफ  आवाजें उठती रही है, इसके बावजूद यह अभी तक यह जारी है। इसे रोकने और स्वदेशी माल को प्रोत्साहन देने का समय आ गया है।  निर्यात कामकाज चालू हो गया है। अफ्र ीका की डे्रस मटीरियल की मांग निकली है। साड़ी तथा डे्रस में स्थानीय मांग भी धीरे-धीरे बढ़ रही है। साड़ी तथा डे्रस के लिए ग्रे कपड़ों का अभी दक्षिण भारत में भरपूर स्टॉक होने से माल की कोई समस्या नहीं है। समस्या साड़ी एवं डे्रस मटीरियल में प्रिंटिंग इत्यादि करने वाले कारीगरों की है। युनिटों में काम हो रहा है, लेकिन कारीगर कम हैं। हाल न तो कच्चे माल की और न मांग की कोई समस्या है। यह कपड़ा अधिकतर जेतपुर से आता है, जहां श्रमिकों की तादाद उत्तरप्रदेश, राजस्थान, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल की है, जो हाल अपने गांव चले गए हैं। इन श्रमिकों को बुलाने की पहल भी की गई, परंतु अभी आने में कुछ वक्त तो लगेगा ही। 

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